Advertisement (468 x 60px )


Thursday, 8 September 2011

नज़्म




वफ़ा को मैं ज़फा लिखूं,


ज़फा को मैं वफ़ा लिखूं,


सुलगती धुप की किरणों को ,


सावन की घटा लिखूं .


मेरी मजबूरियों को तू जो ,


चमचा नाम देता है ,


बता इस दौर में मै ,


ये न लिखूं तो क्या लिखूं.



...सुनियेगा अगली पंक्ति तबज्जो से



वफादारी निभाने में अदाकारी नहीं करता,


वो अहमक जो गद्दारों से गद्दारी नहीं करता.


वफादारी का ये आलम कि सब कुत्ता समझते हैं,


यही सब सोच कर मै वफादारी नहीं करता .


.

...सुनियेगा अगली पंक्ति ...



किसी कंजूस मौलवी के यहाँ कुछ लोग जब पहुंचे ,


अचानक देख कर लोगों को मौलवी एक दम चौके ..


होठो पर लाया झूठा तबस्सुम और यूँ बोले ,


अजी ! हज़रात कैसे आये हैं , क्या काम है मुझसे ..?


कहा लोगों ने कब्रिस्तान की रक्षा जरुरी है ,



वहां चारो तरफ दीवार का होना जरुरी है ,


खुदा के नाम पर कुछ आप भी तो कीजिये साहब ,


दीवार खड़ा करने के लिए चंदा तो दीजिये साहब ..


चंदा मांगने वालो से मौल्लावी ने ये फ़रमाया ...


वहाँ चारो तरफ दीवार हो जाए जरुरी क्या ?


जो अन्दर है वो किसी सूरत से बाहर नहीं आ सकते.


और जो बाहर है वो जीते जी तो अन्दर नहीं जा सकते .



...हाज़िर है एक और नज़्म ...नज़्म का उल्वान है पडोसी का *मुर्ग* (मुर्ग = Chicken)



एक मौल्लावी ने मुर्ग पकड़ कर पका लिया,


बच्चों के साथ बैठ कर,खुश हो कर खा लिया..


था जिसका मुर्ग ,ढूंढता फिरता था बेक़रार ,


हर घर में जा कर पूछ रहा था वो बार -बार ,


बस बच गया था मौल्लावी साहब का वो घर,


जिस घर पर डाली न थी एक बार भी नज़र ,


लेकिन तलाश-ए-मुर्ग ने लाचार कर दिया,


...पुछा वो मौलवी से क्या देखा है आपने ,


जिस मुर्ग को दारोगा मैं कहता हूँ प्यार से ?


बोले वो मौल्लावी , मै सच-सच बताऊंगा ,


वरना खुदा-ए-पाक को क्या मुह दिखाऊंगा ,


लम्हा-ए-चाँद मेरी छत पर गुजार के ,


आया तो था चला गया वर्दी उतार के .


By~सुनील कुमार तंग .


Tuesday, 25 January 2011

पथिक








भोर हो गयी...
कब सांझ ढल जाये ।
मन न माने , मोहित हो जाये ।
परदे के आड़ से बगुलों को निहारे।
नदी के किनारे , उंगलियों को उठाये ।
भ्रमित सा होकर , अनजाने डगर पर ,
चोटिल पैरों को , बे-मन दौड़ाये ।

क्या करें ? कहाँ जायें ?
किससे मिलें, किसको बुलाये ,
दिल और दिमाग से अपंग बनाये ,
मन न माने , मोहित हो जाये ।

अनजाने राह पर , कंटीले बाग़ में ,
अजनबी , बेसहारा पथिक बनाए ।



~यज्ञ दत्त मिश्र
२:३९ प्रातः २५/१/2011

Wednesday, 1 December 2010

मीरा के गिरधर




एक बार और बजा दो न प्रभु ,
अपनी ये सुरीली बाँसुरिया ,
जियरा बौराया है आपके प्रेम में,
बैठ कर बिताती हूँ सारी रतियाँ।

===============================
भूख प्यास सब ले गए ओ गिरधर,
प्रेम की बाँसुरिया तो छोड़ जाओ न ,

मटकी उठाई मैंने आपके प्रीत की ,
कभी मेरी मटकी भो फोड़ जाओ

कितना झूमते हो ग्वालन बीच प्रभु,
कभी मेरी बगिया भी कोड़ जाओ न ।

बुन कर रखी हूँ , गुलाब की लड़ियाँ ,
कभी आकर इन्हें भी तोड़ जाओ न ।

तानें मारे लोग , गोहराये कह कर गुजरिया ,
कभी आकर इनकी बातें मरोड़ जाओ न ।

बैठी हूँ आश में ओ श्याम !
घुंघटा चढ़ाये,सिन्धुर सजाये ,
वीणा बजाये , काजल लगाये ,
कभी मूर्ति से बाहर झाँक जाओ न ।

================================


~यज्ञ दत्त मिश्र
१/१२/२०१० ६:०२ प्रातः

Sunday, 28 November 2010

मै चलता रहूँगा .







अब न रुकुंगा ,
न डहर भूलूंगा ,
दिल में दहक ले ,
मैं चलता रहूँगा।

मंजिल नजदीक नहीं,
न मंजिल से दूर हूँ,
वक़्त का आभाव है ,
मै चलता रहूँगा।
--------------------------------------
अजनबी वो थे ,
अब हम बन कर फिरते हैं ।
लाखों है पीठ पर लदे ,
आशाओं के मोमबत्ती हाथ लिए ,
निराश नहीं करूँगा।
मै चलता रहूँगा
---------------------------------------
खग नहीं खगेश हूँ,
व्योम के साम्राज का...
अजेय अवधेश हूँ ,
मानवता में अहिंसा का
बदलता परिवेश हूँ
परिवेश को परिवेश से ,
बदलता रहूँगा


अब रुकुंगा ,
डहर भूलूंगा ,
दिल में दहक ले ,
मैं चलता रहूँगा



~यज्ञ दत्त मिश्र
११/२८/२०१० ५:५४ सायं काल ।